Dreams

Dreams

कुछ सपने थे इस मुठ्ठीमे
जाने कहां वो खो गये
आधी खुली हथेलीसे
रेत की तरह फिसल गये

बाकी बेचारे नादानसे
पेटकी भूक है बोलते
कुछ ही होते जिद्दी इतने
जो दिलको है टटोलते

और उन सपनोका क्या
जो बंद आंखोमे है समाये
हाथोंकी लकीरोमे फिर
जाकर ये छुप जाये

कुछ होते है जब पूरे
तब कहते है हम दिलसे
राह चलता रह ए दोस्त
क्यूं कतराये मंजीलसे

और जब टूट बिखरता है
नन्हासा कोई इक सपना
तब रोते है हम यूं
जैसे खोया हो कोई अपना

जैसे लोग वैसे सपने
या सपनो जैसे लोग
दिनमे सपने देखनेका
हमे लगा है रोग

दिनके इन अलहड सपनोमे
ना है सितारोंकी मेहफिल
रातके सपनोका क्या है
ना कोई रस्ता नाही मंजील

रातके सपनोमे होती
खुदको खुदकी खोज
दिन दिन सपने देख देख
सब लोग उडाते मौज

ये सबूत है इस बातका
की अभी बहूत है करनेको
पेहले नदी फीर दरीया
है बनना इस झरनेको

सपनोकी इस दुनियासे
बाहर निकलना मुश्कील
पर ना आवो तो कैसे हो
मंजील अपनी हासील

इसिलीये हमनेभी यहां
सपने देखे नये नये
कुछ हुए है पुरे जरुर
कुछ हाथसे फिसल गये

कुछ सपने थे इस मुठ्ठीमे
जाने कहां वो खो गये
आधी खुली हथेलीसे
रेत की तरह फिसल गये

– अभिजीत

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Abhijeet Jog

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